मुंबई : एमएसीटी ने दिलाया 21,00,00,000 रूपयों का मुआवाजा, एचयूएल मैनेजरों की मुंबई हाइवे दुर्घटना में हुई थी मौत, जानिए लीगल एंगल
Mumbai: MACT awards compensation of Rs 21,00,00,000 to HUL managers who died in Mumbai highway accident; know the legal angle
किसी भी परिवार के मुखिया की यदि सड़क हादसे में जान चली जाए, तो उसकी दुख वही परिवार जानता है। किसी कमाऊ सदस्य की मौत का असर केवल उसकी तत्काल आय के खत्म होने तक सीमित नहीं होता। परिवार की शिक्षा, आवास, बचत और भविष्य की आर्थिक सुरक्षा भी प्रभावित होती है। इसी पहलू को मुंबई एमएसीटी ने एचयूएल के दो मैनेजरों की मौत से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण माना है। मृतक की कमाई परिवार के जीवन स्तर और आर्थिक सुरक्षा में योगदान करती थी।
मुंबई : किसी भी परिवार के मुखिया की यदि सड़क हादसे में जान चली जाए, तो उसकी दुख वही परिवार जानता है। किसी कमाऊ सदस्य की मौत का असर केवल उसकी तत्काल आय के खत्म होने तक सीमित नहीं होता। परिवार की शिक्षा, आवास, बचत और भविष्य की आर्थिक सुरक्षा भी प्रभावित होती है। इसी पहलू को मुंबई एमएसीटी ने एचयूएल के दो मैनेजरों की मौत से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण माना है। मृतक की कमाई परिवार के जीवन स्तर और आर्थिक सुरक्षा में योगदान करती थी।
2018 में हुआ हादसा और विवाद की शुरुआत
हादसा 1 जुलाई 2018 को मुंबई-गोवा नेशनल हाईवे 66 पर रत्नागिरी जिले के खेड़ तालुका में डाभिल स्कूल के पास हुआ था। गिरिश बारवे और राजेश वाडलकर दो अन्य सहकर्मियों के साथ कार में यात्रा कर रहे थे। इसी दौरान सामने से आ रहे टैंकर से कार की आमने-सामने टक्कर हो गई।
ट्रिब्यूनल के सामने पेश रिकॉर्ड के अनुसार टैंकर तेज गति से आ रहा था और वह अपनी लेन छोड़कर कार की दिशा वाली लेन में आ गया था। टक्कर के बाद टैंकर चालक मौके से चला गया और हादसे की सूचना नहीं दी।
बारवे की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि वाडलकर को पहले स्थानीय स्तर पर उपचार मिला और बाद में मुंबई के अस्पताल ले जाया गया। कई दिनों के इलाज के बावजूद 11 जुलाई 2018 को उनकी भी मौत हो गई।
बाद में बीमा क्लेम के समय ट्रिब्यूनल के समक्ष परिवारों ने बताया कि दोनों मृतक उच्च शिक्षित और अपने-अपने क्षेत्र में सफल पेशेवर थे तथा उनके करियर की संभावनाएं भी मजबूत थीं। इसी कारण मुआवजे की गणना में केवल उस समय की आय नहीं, बल्कि भविष्य की आर्थिक संभावनाओं का पहलू भी महत्वपूर्ण बना।
लेकिन बीमा कंपनी की ओर से मृतकों की पत्नियों की अपनी नौकरी और आय को मुआवजे में कटौती का आधार बनाने की कोशिश की गई।
एमएसीटी में मुआवजे का फैसला औऱ बीमा कंपनी की आपत्ति
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार गिरिश बारवे की सकल वार्षिक आय करीब ₹95 लाख थी, जबकि राजेश वाडलकर की वार्षिक आय करीब ₹42 लाख बताई गई। इसी आय और आश्रित परिवार की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए एमएसीटी में मुआवजे की गणना की गई।
बीमा पक्ष की ओर से यह तर्क दिया गया कि मृतकों की पत्नियां स्वयं कमाती थीं, इसलिए परिवार की वास्तविक आर्थिक निर्भरता कम मानी जानी चाहिए। लेकिन ट्रिब्यूनल ने इस सोच को खारिज कर दिया।


