पश्चिम बंगाल मतदाता सूची विवाद: चुनाव आयोग पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती, टीएमसी के आरोपों के बाद मांगा जवाब

West Bengal voter list controversy: Supreme Court takes a dig at Election Commission, seeks response after TMC's allegations

पश्चिम बंगाल मतदाता सूची विवाद: चुनाव आयोग पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती, टीएमसी के आरोपों के बाद मांगा जवाब

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले चल रहे मतदाता सूची के विशेष गहण पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर जहां ओर राज्यभर की सियासत में गर्माहट तेज है। वहीं अब इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी सख्ती दिखाई है। सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के एसआईआर को लेकर दायर नई याचिकाओं पर चुनाव आयोग से जवाब मांगा है। ये याचिकाएं तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के सांसद डेरेक ओ ब्रायन और डोला सेन ने दाखिल की हैं।

नई दिल्ली : पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले चल रहे मतदाता सूची के विशेष गहण पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर जहां ओर राज्यभर की सियासत में गर्माहट तेज है। वहीं अब इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी सख्ती दिखाई है। सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के एसआईआर को लेकर दायर नई याचिकाओं पर चुनाव आयोग से जवाब मांगा है। ये याचिकाएं तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के सांसद डेरेक ओ ब्रायन और डोला सेन ने दाखिल की हैं।

 

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टीएमसी सांसदों का आरोप है कि पश्चिम बंगाल में चल रही वोटर लिस्ट संशोधन प्रक्रिया में मनमानी और नियमों की अनदेखी की जा रही है। ऐसे में सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने इन आरोपों को गंभीरता से लेते हुए चुनाव आयोग को एक हफ्ते में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले में अगली सुनवाई 19 जनवरी को होगी।

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अब जानिए चुनाव आयोग पर क्या आरोप लगे?
टीएमसी सांसद डेरेक ओ ब्रायन की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कोर्ट को बताया कि चुनाव आयोग अपने निर्देश व्हाट्सऐप जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए दे रहा है। बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) बिना किसी लिखित आदेश के काम कर रहे हैं, जो पूरी प्रक्रिया को सवालों के घेरे में लाता है। उन्होंने यह भी कहा कि आयोग ने तार्किक विसंगति नाम से मतदाताओं की एक नई श्रेणी बना दी है, जिसके आधार पर लाखों लोगों को नोटिस भेजे जा रहे हैं और सुनवाई के लिए बुलाया जा रहा है, जबकि इसका कोई लिखित नियम या आदेश नहीं है।

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कितने नाम हटाने का दावा?
वहीं याचिका में कहा गया है कि 16 दिसंबर 2025 को प्रकाशित ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में 58 लाख से ज्यादा मतदाताओं के नाम बिना नोटिस हटाए गए। इसके अलावा करीब 1.36 करोड़ मतदाताओं को कथित तौर पर नोटिस देने की तैयारी की गई, जो पूरी तरह अव्यवस्थित और गैरकानूनी है।

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दावा- आम लोगों को हो रही परेशानी
इसके साथ ही याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि बुजुर्गों, दिव्यांगों और बीमार लोगों को जबरन सुनवाई के लिए बुलाया जा रहा है। लंबी कतारें, दस्तावेजों को लेकर भ्रम और नोटिस में साफ कारण नहीं बताया जा रहा। राजनीतिक दलों के बूथ एजेंटों को भी मतदाताओं की मदद से रोका जा रहा है

याचिका में कोर्ट से की गई ये मांग
टीएमसी सांसदों ने कोर्ट से मांग की है कि 15 जनवरी 2026 की दावों-आपत्तियों की अंतिम तारीख बढ़ाई जाए। व्हाट्सऐप या मौखिक निर्देशों को अवैध घोषित किया जाए। चुनाव आयोग को हर निर्देश लिखित रूप में जारी करने का आदेश दिया जाए। इसके साथ ही याचिका में यह भी कहा गया है कि मतदाता सूची में नाम होना नागरिक का संवैधानिक और कानूनी अधिकार है, और इससे जुड़ी प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और कानून के अनुसार होनी चाहिए।

ममता बनर्जी भी जाएंगी कोर्ट
गौरतलब है कि इससे पहले पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी एसआईआर के खिलाफ अदालत जाने का ऐलान किया था। उन्होंने आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया से लोगों में डर, उत्पीड़न और प्रशासनिक मनमानी बढ़ी है, जिसके कारण मौत, अस्पताल में भर्ती और आत्महत्या के प्रयास तक हुए हैं।