भारत में जल्द आने वाली है कोरोना की वैक्सीन

भारत में जल्द आने वाली है कोरोना की वैक्सीन

इस समय पूरी दुनिया कोरोना महामारी के जाल में फंसी हुई है और विश्व का हर मुल्क इस घातक वायरस के खात्में के लिए वैक्सीन बनाने की जद्दोजहद में जुटा हुआ है. भारत में भी कोरोना से लगभग 12 लाख लोग पीड़ित हैं. देश में कोरोना के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं ऐसे में जल्दी कोरोना वैक्सीन नहीं आई तो सचमुच बहुत देर हो जायेगी. इसी बीच एक राहत की खबर सामने आई है.

पूणे की सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (SII) ने कहा है कि कंपनी इस साल दिसंबर तक ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और एस्ट्राजेनेका (AstraZeneca) द्वारा विकसित प्रायोगिक कोविड -19 वैक्सीन की 3 से 4 मिलियन खुराक का उत्पादन करने जा रही है.

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SII के मुख्य कार्यकारी अधिकारी, अदार पूनावाला ने कहा कि covishield पहली कोविड -19 वैक्सीन है, जिसे कि यूके और भारत दोनों में परीक्षण सफल होने पर उन्हें लॉन्च किए जाने की उम्मीद है. उन्होंने कहा कि अगर सब कुछ सही रहता है तो अगले साल जून या फिर इससे पहले भारत में कोविड19 की वैक्सीन आ जाएगी.

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अदार पूनावाला ने वैक्सीन की कीमत के बारे में कहा कि कंपनी हालात को देखते हुए शुरुआत में मुनाफा कमाने के बारे में नहीं सोच रही है. इसलिए शुरुआत में इसकी कीमत 1000 रुपये हो सकती है. सीरम इंस्टीट्यूट द्वारा वैक्सीन के कुल प्रॉडक्शन में से 50 फीसदी भारत के लिए होगा और बाकी 50 फीसदी अन्य देशों के लिए.

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सीरम इंस्टीट्यूट दुनिया में सबसे बड़ी वैक्सीन मैन्युफैक्चरर है. सीरम इंस्टीट्यूट ने ब्रिटिश कंपनी AstraZeneca के साथ साझेदारी की है. इसके तहत वह एस्ट्राजेनेका और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा तैयार की जा रही कोविड-19 वैक्सीन का उत्पादन करेगी. एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन ह्यूमन ट्रायल्स के तीसरे चरण में है.

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चार चरणों में होता है वैक्सीन का परीक्षण
वैक्सीन के परीक्षण के चार चरण होते हैं. पहला चरण प्री-क्लीनिकल ट्रायल का होता है, जिसमें जानवरों पर परीक्षण किया जाता है. इसके बाद पहले फेज का क्लीनिकल ट्रायल होता है, जिसमें छोटे समूह पर यह जांचा जाता है कि टीका कितना सुरक्षित है. दूसरे फेज के क्लीनिकल ट्रायल में थोड़े बड़े समूह पर यह जांचा जाता है कि टीका कितना सुरक्षित है. तीसरे फेज में कई हजार लोगों को टीका लगाकर वायरस को रोकने की दिशा में टीके का प्रभाव परखा जाता है.

फिलहाल वैक्सीन को लेकर वैज्ञानिक ये मानकर चल रहे हैं कि ये केवल बीमारी की गंभीरता को कम कर सकती है. जिसका मतलब है कि कोरोना वायरस से लोगों के मरने की संभावना कम होगी.

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