वॉशिंगटन : रूस पर कड़े प्रतिबंधों वाले बिल पर ट्रंप करेंगे हस्ताक्षर... भारत पर क्या होगा इस फैसले का असर?

Washington: Trump to sign bill imposing tough sanctions on Russia... What impact will this decision have on India?

वॉशिंगटन : रूस पर कड़े प्रतिबंधों वाले बिल पर ट्रंप करेंगे हस्ताक्षर... भारत पर क्या होगा इस फैसले का असर?

भारत और अमेरिका के व्यापारिक संबंध पहले से ही एक नाजुक दौर से गुजर रहे हैं। पिछले साल अगस्त में भी ट्रंप प्रशासन ने रूसी कच्चे तेल के आयात को लेकर भारत पर अतिरिक्त शुल्क लगाए थे, जिन्हें फरवरी 2026 में हटाया गया था। वर्तमान में भारत पर पहले से ही जबरन श्रम से बने सामानों के आयात को रोकने में नाकामी के नाम पर 10% का जुर्माना शुल्क लागू है। ऐसे में यदि यह नया टैरिफ भी लग जाता है, तो यह ट्रंप के कार्यकाल में भारत पर लगने वाला अब तक का सबसे बड़ा शुल्क होगा, जो दोनों देशों के संबंधों में नई कड़वाहट घोल सकता है।

वॉशिंगटन : अमेरिका की राजनीति में एक बार फिर भारत और रूस के व्यापारिक रिश्तों को लेकर बड़ी हलचल शुरू हो गई है। अमेरिकी संसद के निचले सदन यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने एक कड़ा बिल पारित किया है, जिसका सीधा असर भारत के तेल आयात और आर्थिक विकास पर पड़ सकता है। इस नए और कड़े बिल का नाम 'द लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026' है।

बता दें कि इस बिल को पहले सीनेट से हरी झंडी मिली थी और अब हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने भी इसे 262-159 के बहुमत से पास कर दिया है। ऐसे में अब यह कानून बनने के लिए राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के हस्ताक्षर के लिए उनके टेबल पर पहुंच गया है।

इस बिल का मुख्य उद्देश्य रूस की अर्थव्यवस्था और उसकी युद्धक क्षमताओं को कमजोर करना है। इसके तहत रूस के नेतृत्व, ऊर्जा क्षेत्र और उसकी मदद करने वाले गुप्त जहाजों के बेड़े पर कड़े प्रतिबंध लगाने का प्रावधान है।

इस बात को ऐसे समझिए कि इस विधेयक में एक महत्वपूर्ण संशोधन डेमोक्रेटिक सांसद स्टेनी होयर द्वारा जोड़ा गया था। इस संशोधन में स्पष्ट रूप से 10 देशों भारत, चीन, यूएई, तुर्किए, सिंगापुर, अजरबैजान, कजाकिस्तान, हंगरी, किर्गिस्तान और स्लोवाकिया का नाम लिया गया है।
इस विधेयक के तहत, यदि ये देश रूस से तेल और गैस खरीदना जारी रखते हैं, तो अमेरिकी राष्ट्रपति के पास इन देशों पर 100 प्रतिशत तक का भारी-भरकम आयात शुल्क यानी टैरिफ लगाने का पूर्ण अधिकार होगा।

अच्छा, इस बात को समझना ज्यादा मुश्किल भी नहीं है। इसको ऐसे समझिए कि यूक्रेन युद्ध की शुरुआत के बाद से भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए रियायती दरों पर बड़े पैमाने पर रूस से कच्चा तेल खरीदना शुरू किया है। हाल ही में ईरान संघर्ष के बाद अप्रैल में भारत का रूसी तेल आयात 11 महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया था। ऐसे में यदि अमेरिका इस कानून के तहत कड़े कदम उठाते हुए 100% तक का शुल्क लगाता है, तो भारत के लिए रूस से तेल आयात करना आर्थिक रूप से बेहद महंगा और चुनौतीपूर्ण हो जाएगा।

देश के जाने-माने अर्थशास्त्रियों और रेटिंग एजेंसियों का मानना है कि अमेरिका की तरफ से यदि ऐसे भारी शुल्क लगाए जाते हैं, तो इससे वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता बढ़ेगी। यह भारत के समग्र आर्थिक विकास की संभावनाओं पर नकारात्मक असर डाल सकता है।

भारत और अमेरिका के व्यापारिक संबंध पहले से ही एक नाजुक दौर से गुजर रहे हैं। पिछले साल अगस्त में भी ट्रंप प्रशासन ने रूसी कच्चे तेल के आयात को लेकर भारत पर अतिरिक्त शुल्क लगाए थे, जिन्हें फरवरी 2026 में हटाया गया था। वर्तमान में भारत पर पहले से ही जबरन श्रम से बने सामानों के आयात को रोकने में नाकामी के नाम पर 10% का जुर्माना शुल्क लागू है। ऐसे में यदि यह नया टैरिफ भी लग जाता है, तो यह ट्रंप के कार्यकाल में भारत पर लगने वाला अब तक का सबसे बड़ा शुल्क होगा, जो दोनों देशों के संबंधों में नई कड़वाहट घोल सकता है।

गौर करने वाली बात यह है कि ऐसा नहीं है कि इस विधेयक के पास होने से ही स्वतः भारत पर 100% टैक्स नहीं लग जाएगा। यह पूरी तरह से राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप पर निर्भर करेगा कि वह इस कानूनी अधिकार का उपयोग करते हैं या नहीं।

इस बात को ऐसे समझिए कि यह कानून अमेरिकी राजनीति में भी पूरी तरह से आम सहमति से पास नहीं हुआ है। इसके पक्ष और विरोध में तीखी बहस देखने को मिली है। ऐसे में इस कानून का समर्थन करने वालों का मानना है कि रूस को यूक्रेन युद्ध के खिलाफ आर्थिक रूप से अलग-थलग करने के लिए कड़े कदम उठाने जरूरी हैं। उनका कहना है कि चीन और भारत जैसे देश रियायती दरों पर रूसी तेल खरीदकर अप्रत्यक्ष रूप से रूस की मदद कर रहे हैं।

दूसरी तरफ इस विधेयक को लेकर विरोधियों की अलग चिंता है। इस बात को ऐसे समझिए कि डेमोक्रेटिक पार्टी के एक बड़े धड़े, जिसका नेतृत्व ग्रेगरी मीक्स और हाकीम जेफ्रीज ने किया ने इसका विरोध किया। उनका तर्क था कि यह कानून अमेरिकी राष्ट्रपति को अत्यधिक और असीमित कर लगाने की शक्ति दे देता है, जिससे वैश्विक व्यापार में भारी अनिश्चितता पैदा होगी।

Read More ट्राई (TRAI) का रुख: '1600' सीरीज की कॉल ब्लॉक करना संभव नहीं, ट्रू कॉलर विवाद के बीच समर्पित नंबर प्रणाली का बचाव

 

Read More छात्र प्रदर्शन पर पुलिस कार्रवाई की होगी जांच! सुप्रीम कोर्ट ने बनाया 5 सदस्यीय हाई-पावर्ड पैनल