1993 मुंबई ब्लास्ट केस: अबू सालेम की समय पूर्व रिहाई की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा

1993 Mumbai blasts case: Supreme Court reserves verdict on Abu Salem's plea for premature release

1993 मुंबई ब्लास्ट केस: अबू सालेम की समय पूर्व रिहाई की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा

1993 मुंबई ब्लास्ट केस के दोषी अबू सालेम ने पुर्तगाल प्रत्यर्पण संधि के 25 साल के आश्वासन और जेल में मिली छूट (Earned Remission) का हवाला देकर सुप्रीम कोर्ट से रिहाई की मांग की है। बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा याचिका खारिज होने के बाद अब सुप्रीम कोर्ट ने इस पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।

नई दिल्ली (27 जुलाई 2026): सुप्रीम कोर्ट ने 1993 के मुंबई सिलसिलेवार बम धमाकों के दोषी गैंगस्टर अबू सालेम की उस याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है, जिसमें उसने 25 साल की जेल की सजा पूरी होने का दावा करते हुए अपनी रिहाई की मांग की है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने मामले की सुनवाई के बाद सालेम की कानूनी टीम को एक हफ्ते के भीतर लिखित दलीलें और संबंधित फैसले पेश करने की अनुमति दी।

​मामले के मुख्य बिंदु और अदालत में दलीलें:
  • 25 साल की समय सीमा और प्रत्यर्पण संधि: अबू सालेम को 11 नवंबर 2005 को पुर्तगाल से भारत लाया गया था। भारत सरकार ने पुर्तगाल को यह आश्वासन दिया था कि उसे न तो मृत्युदंड दिया जाएगा और न ही उसकी सजा 25 साल से अधिक होगी।

 

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  • अर्जित छूट (Earned Remission) का तर्क: सालेम के वकील ऋषि मल्होत्रा ने दलील दी कि विचाराधीन कैदी (undertrial) के रूप में बिताए गए समय और जेल में अच्छे आचरण के कारण मिली छूट (Earned Remission) को मिलाकर उसकी कुल हिरासत 25 साल (लगभग 26 साल 9 महीने) से अधिक हो चुकी है।

 

  • बॉम्बे हाई कोर्ट का रुख: इससे पहले बॉम्बे हाई कोर्ट ने सालेम की इस याचिका को खारिज कर दिया था। हाई कोर्ट का कहना था कि प्रत्यर्पण संधि के तहत 25 साल की अवधि नवंबर 2030 में पूरी होगी और जेल नियमों के तहत मिलने वाली सामान्य छूट का इस्तेमाल 25 साल की इस निश्चित सीमा को और कम करने के लिए नहीं किया जा सकता।

 

  • अदालत की टिप्पणी: सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सालेम के वकील से पूछा कि क्या वे इस याचिका पर एक विस्तृत आदेश चाहते हैं या खारिज किए जाने की स्थिति स्वीकार करेंगे। वकील ने विस्तृत फैसले का अनुरोध किया, जिसके बाद शीर्ष अदालत ने अपना आदेश सुरक्षित रख लिया।

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