महाराष्ट्र में RTI अपीलों का बढ़ता बैकलॉग, लंबित मामलों में 38% की बढ़ोतरी से पारदर्शिता पर सवाल

Rising backlog of RTI appeals in Maharashtra, 38% increase in pending cases raises questions about transparency

महाराष्ट्र में RTI अपीलों का बढ़ता बैकलॉग, लंबित मामलों में 38% की बढ़ोतरी से पारदर्शिता पर सवाल

महाराष्ट्र में RTI की दूसरी अपीलों का बैकलॉग 38% बढ़ गया है। मार्च 2026 तक लंबित मामलों की संख्या 5,060 पहुंच गई है, जिससे सूचना प्राप्त करने में देरी और सरकारी जवाबदेही को लेकर चिंता बढ़ रही है। #RTI #MaharashtraNews #RightToInformation #Transparency #MumbaiNews #BreakingNews #Governance #Accountability


महाराष्ट्र में सूचना का अधिकार (RTI) कानून के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। हाल ही में सामने आए आंकड़ों के अनुसार, राज्य में लंबित दूसरी अपीलों (Second Appeals) की संख्या में करीब 38 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे सूचना प्राप्त करने की प्रक्रिया और सरकारी जवाबदेही पर सवाल उठने लगे हैं।


पारदर्शिता के क्षेत्र में काम करने वाले संगठन Sajag Nagrik Manch द्वारा प्राप्त जानकारी के अनुसार, मार्च 2026 तक लंबित दूसरी अपीलों की संख्या बढ़कर 5,060 हो गई, जबकि वर्ष की शुरुआत में यह आंकड़ा 3,672 था। इस दौरान संबंधित आयोग को 4,870 नई अपीलें प्राप्त हुईं, लेकिन केवल 3,482 मामलों का निपटारा हो सका।

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RTI कार्यकर्ताओं का कहना है कि कई नागरिकों को दूसरी अपील की सुनवाई के लिए दो से तीन साल तक इंतजार करना पड़ रहा है। उनका मानना है कि इतनी लंबी देरी से RTI कानून का मूल उद्देश्य—समयबद्ध सूचना उपलब्ध कराना—कमजोर पड़ रहा है।

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विशेषज्ञों के अनुसार, अपीलों में वृद्धि का एक बड़ा कारण सरकारी विभागों द्वारा सूचना देने से इनकार, अधूरी जानकारी उपलब्ध कराना या जवाब देने में देरी है। कई मामलों में व्यक्तिगत जानकारी, सार्वजनिक हित की कमी या रिकॉर्ड की अधिकता जैसे कारणों का हवाला देकर आवेदन खारिज किए जाते हैं, जिसके बाद नागरिकों को अपील का सहारा लेना पड़ता है।

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सजग नागरिक मंच की प्रतिनिधि त्रिशिला कांबले ने चिंता जताते हुए कहा कि जब तक अपीलों पर फैसला आता है, तब तक संबंधित अधिकारी कई बार स्थानांतरित हो चुके होते हैं, जिससे जवाबदेही तय करना मुश्किल हो जाता है।

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RTI विशेषज्ञों का मानना है कि आयोगों में रिक्त पदों को भरने, सुनवाई की गति बढ़ाने, डिजिटल प्रक्रियाओं को मजबूत करने और सरकारी विभागों द्वारा स्वप्रेरित सूचना प्रकटीकरण (Proactive Disclosure) बढ़ाने से इस समस्या को कम किया जा सकता है।