मुंबई के मलाड में एक मदरसे के 22 हाफिज SSC परीक्षा में कामयाब

मुंबई के मलाड में एक मदरसे के 22 हाफिज SSC परीक्षा में कामयाब

मुंबई : मुंबई के मलाड में एक ही इमारत से संचालित जामिया ताजवीदुल कुरान मदरसा और नूर मेहर उर्दू स्कूल ने पिछले एक दशक में 97 हाफिज पैदा किए हैं, जिन्होंने एसएससी भी पास किया है.

मुंबई के मलाड के मदरसे में पढ़ने वाले अबू तल्हा अंसारी खुश हैं क्योंकि उन्होंने सीनियर सेकेंडरी सर्टिफिकेट (एसएससी) की परीक्षा में 83.4 फीसद अंक हासिल किए हैं. एसएससी परीक्षा के नतीजे शुक्रवार को आए हैं. पर अंसारी की खुशी दोहरी है क्योंकि इसके साथ ही उनका हाफिज का पाठ्यक्रम यानी पूरा कुरान याद हो जाना भी पूरा हो गया है.

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अंसारी वह मालवानी (मलाड) स्थित जामिया ताजवीदुल कुरान मदरसा और नूर मेहर उर्दू स्कूल के 22 हफ़्ज़ (हाफ़िज़ का बहुवचन) या हाफ़िज़ में से एक हैं, जिन्होंने इस साल एसएससी परीक्षा पास की है.

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अंग्रेजी अखबार द टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित एक खबर में स्कूल-मदरसा के संस्थापक सैयद अलीक कहते हैं, “इस साल एसएससी परीक्षा देने वाले 22 हफ़्ज़ में से 14 ने डिस्टिंक्शन के साथ पास किया जबकि आठ ने 60% से अधिक अंक प्राप्त किए. हमें खुशी है कि हमारे छात्रों ने इतना अच्छा प्रदर्शन किया है.”

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असल में, बहुत से लोग अपने घर के अतिरिक्त हिस्से का उपयोग “हॉलिडे होम” के रूप में करते हैं या अतिरिक्त पैसे कमाने के लिए किराए पर उठा देते हैं. लेकिन अली भाई के नाम से मशहूर एक व्यापारी अली ने अपने मलाड बंगले को एक शैक्षणिक संस्थान में बदल दिया.

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2000 में शुरू, स्कूल और मदरसे ने 2011 में 13 हाफिज के साथ एसएससी पास आउट का अपना पहला बैच तैयार किया. पिछले एक दशक में, इस मदरसे से 97 हाफिज पास होकर निकले हैं और साथ ही वह एसएससी परीक्षा में भी उत्तीर्ण हुए हैं. अब जिनमें से कई उच्च अध्ययन के लिए गए हैं या काम कर रहे हैं. अली भाई कहते हैं, ”हमारे कुछ हाफिज अब इंजीनियर, डॉक्टर और फार्मासिस्ट हैं.”

मदरसा शिक्षा के आधुनिकीकरण की बहस बहुत पुरानी है. अधिकांश मदरसे विज्ञान और गणित जैसे आधुनिक विषयों को अपने पाठ्यक्रम में शामिल करने से हिचकते हैं. क्योंकि उन्हें डर है कि यह धार्मिक विषयों की शिक्षा को कमजोर कर देगा.

हालांकि, अली भाई के संस्थान में सामान्य स्कूली 13 और मदरसे के लिए 9 शिक्षक हैं और उनका यह अभिनव प्रयोगआगे का रास्ता दिखाता है.

अखबार ने अपनी रिपोर्ट में कैरियर काउंसलर शेख अखलाक अहमद को उद्धृत किया है जिन्होंने शुरुआत में छात्रों के मार्गदर्शन और परामर्श के साथ संस्थापक की मदद की थी. अहमद कहते हैं, “यह देश के कई मदरसों में दोहराया जा सकता है. आधुनिक विषयों की पढ़ाई के दौरान धार्मिक विषयों की शिक्षा बिल्कुल भी बाधित नहीं होती है.”

हालांकि, पिछला कुछ समय बहुत बुरा गुजरा और पढ़ाई वाकई कठिन थी. लगातार ऑनलाइन पढ़ाई और कुछ महीनों की ऑफलाइन पढ़ाई के बाद यह कामयाबी वाकई सुनहरी और भविष्यपरक मानी जानी चाहिए.

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