हाई कोर्ट से राहत के बावजूद बांद्रा के गरीब नगर के 100 परिवारों का हाल बेहाल, अभी भी कर रहे नए घर का इंतजार
Despite the High Court's relief, 100 families in Bandra's Garib Nagar are in a miserable state, still waiting for new homes.
मुंबई के बांद्रा पूर्व स्थित गरीब नगर (Garib Nagar) में झुग्गीवासियों को बॉम्बे हाई कोर्ट से राहत तो मिल गई है, लेकिन जमीन पर इसका कोई असर नहीं दिख रहा है। रेलवे की डिमोलिशन कार्रवाई के बाद बेघर हुए करीब 100 परिवार अभी भी अपने पुनर्वास और नए आशियाने का इंतजार कर रहे हैं। अदालती आदेश के बावजूद प्रशासनिक लेटलतीफी के कारण ये परिवार खुले आसमान के नीचे दयनीय स्थिति में जीने को मजबूर हैं।
मुंबई: मुंबई के बांद्रा पूर्व स्थित गरीब नगर (Garib Nagar) इलाके में रहने वाले सैकड़ों परिवारों के लिए बॉम्बे हाई कोर्ट (Bombay High Court) का फैसला कागजों पर तो बड़ी राहत लेकर आया है, लेकिन हकीकत में उनकी जिंदगी में कोई सुधार नहीं हुआ है। रेलवे की जमीन से अतिक्रमण हटाने के नाम पर हुई भारी तोड़फोड़ के बाद बेघर हुए करीब 100 पात्र परिवार अब भी अपने पुनर्वास (Rehabilitation) और पक्के घर का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।
अदालती आदेश का जमीन पर नहीं दिख रहा असर
हाल ही में बॉम्बे हाई कोर्ट ने गरीब नगर के उन परिवारों को राहत दी थी, जिनके घर सरकारी सर्वेक्षण (Survey) में पात्र पाए गए थे। कोर्ट ने अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिया था कि इन पात्र परिवारों के सुरक्षित पुनर्वास की व्यवस्था की जाए और इन्हें बेघर न छोड़ा जाए। हालांकि, इस आदेश के बावजूद प्रशासनिक मशीनरी की धीमी चाल के कारण इन परिवारों को अब तक उनके वादे के मुताबिक घर नहीं मिल पाए हैं। पीड़ित परिवारों का आरोप है कि उन्हें एक विभाग से दूसरे विभाग के चक्कर कटवाए जा रहे हैं और केवल खोखले आश्वासन मिल रहे हैं।
खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर परिवार
पश्चिम रेलवे (Western Railway) द्वारा बड़े पैमाने पर चलाए गए अतिक्रमण हटाओ अभियान के बाद, इन परिवारों के घर या तो पूरी तरह से मलबे में तब्दील हो गए हैं या आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हो गए हैं। ऐसे में बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों को टूटे हुए टीन-टप्पर, मलबे और प्लास्टिक की तिरपाल के नीचे दिन-रात गुजारने पड़ रहे हैं। बुनियादी सुविधाओं जैसे साफ पानी, शौचालय और सुरक्षित आश्रय के बिना इनका जीवन पहले से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया है।
प्रशासनिक तालमेल की कमी
स्थानीय निवासियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि रेलवे और नागरिक प्रशासन के बीच उचित तालमेल की कमी का सीधा खामियाजा इन गरीब परिवारों को उठाना पड़ रहा है। पुनर्वास प्रक्रिया में हो रही इस लगातार देरी ने अदालती राहत को बेमानी साबित कर दिया है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इन परिवारों की गुहार सुनने के बाद प्रशासन कब अपनी नींद से जागता है और इन्हें इनका हक और छत मुहैया कराता है।


