महाराष्ट्र में जातिगत जनगणना की मांग, NCP इस मांग को लेकर मुख्यमंत्री ठाकरे से करेगी मुलाकात…

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Rokthok Lekhani

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महाराष्ट्र : बिहार में जारी चर्चाओं के बीच महाराष्ट्र में भी जातिगत जनगणना की मांग उठने लगी है। खबर है कि राज्य की महाविकास अघाड़ी सरकार में शामिल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी इस मांग को लेकर मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से मुलाकात करने की तैयारी कर रही है। इधर, बिहार में सीएम नीतीश कुमार की अगुवाई में हुई सर्वदलीय बैठक में जातिगत जनगणना को सहमित मिल गई है। गुरुवार को राकंपा ने अलग-अलग समुदायों के सामाजिक स्तर का पता लगाने के लिए जातिगत जनगणना की मांग उठाई।

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प्रदेश इकाई के अध्यक्ष और जल संसाधन मंत्री जयंत पाटिल ने पत्रकारों से कहा कि एनसीपी इस मुद्दे पर सीएम ठाकरे से सर्वदलीय बैठक बुलाने की अपील करेगी। उन्होंने बताया कि शरद पवार की अध्यक्षता में हुई बैठक में यह फैसला लिया गया है। बिहार मंत्रिपरिषद ने जाति आधारित गणना को गुरुवार को मंजूरी प्रदान करते हुए इसके लिए 500 करोड़ रुपये का आवंटन किया और सर्वेक्षण पूरा करने के लिए 23 फरवरी की समय सीमा निर्धारित की।

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मुख्यमंत्री कुमार की अध्यक्षता में संपन्न मंत्रिपरिषद की बैठक के बाद पत्रकारों को यह जानकारी देते हुए मुख्य सचिव अमीर सुबहानी ने कहा कि सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा अपेक्षित अधिसूचना जारी होते ही काम शुरू हो जाएगा। उन्होंने कहा कि जातियों के सर्वेक्षण के लिए सामान्य प्रशासन विभाग नोडल प्राधिकरण होगा तथा अधिसूचना जल्द से जल्द जारी की जाएगी। सुबहानी ने कहा कि यह कार्य फरवरी, 2023 तक पूर्ण होगा, जिसका नोडल विभाग होगा सामान्य प्रशासन विभाग तथा नोडल पदाधिकारी सभी जिलों में जिला पदाधिकारी होंगे, जो इस कार्य के लिए ग्राम, पंचायत, अन्य सभी स्तरों पर भी विभिन्न विभागों के अधिकारियों/कर्मियों की सेवा ले सकेंगे।

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जाति आधारित गणना में आर्थिक गणना भी शामिल होगी। मुख्यमंत्री द्वारा इस मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक की अध्यक्षता के एक दिन बाद ही मंत्रिपरिषद ने इसकी मंजूरी दी है। केंद्र द्वारा एससी और एसटी के अलावा अन्य जाति समूहों की गणना करने में असमर्थता व्यक्त करने के मद्देनजर राज्य सरकार ने यह अभ्यास शुरू किया है। बिहार विधानमंडल के दोनों सदनों द्वारा जातीय जनगणना के पक्ष में 2018 और 2019 में दो सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित किए गए थे। नीतीश कुमार और मुख्य विपक्षी पार्टी राजद का तर्क रहा है कि विभिन्न सामाजिक समूहों का एक नया अनुमान आवश्यक है क्योंकि पिछली जातीय जनगणना 1921 में हुई थी।


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