नई दिल्ली : डरा रही ऑक्सफोर्ड की ये रिसर्च; पूरी दुनिया में 2050 तक भयंकर गर्मी पड़ने के आसार
New Delhi: This Oxford study is alarming; the world is likely to experience extreme heat by 2050.
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की एक स्टडी ने सबको चौंंका दिया है। इस स्टडी ने चेतावनी दी है कि अगर ग्लोबल वार्मिंग का खतरा ऐसे ही बढ़ता रहा, तो आने वाले कुछ दशकों में दुनिया के अरबों लोग खतरनाक गर्मी की चपेट में आ जाएंगे। यह स्टडी बताती है कि अगर धरती का औसत तापमान औद्योगिक स्तर से 2 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया, जो कि अब बहुत संभव लग रहा है, तो 2050 तक दुनिया की लगभग आधी आबादी (करीब 3.79 अरब लोग) भीषण गर्मी की गिरफ्त में होगी।
नई दिल्ली : ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की एक स्टडी ने सबको चौंंका दिया है। इस स्टडी ने चेतावनी दी है कि अगर ग्लोबल वार्मिंग का खतरा ऐसे ही बढ़ता रहा, तो आने वाले कुछ दशकों में दुनिया के अरबों लोग खतरनाक गर्मी की चपेट में आ जाएंगे। यह स्टडी बताती है कि अगर धरती का औसत तापमान औद्योगिक स्तर से 2 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया, जो कि अब बहुत संभव लग रहा है, तो 2050 तक दुनिया की लगभग आधी आबादी (करीब 3.79 अरब लोग) भीषण गर्मी की गिरफ्त में होगी।
शोधकर्ताओं का कहना है कि इससे पहले भी यानी 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ने पर गर्मी का असर बहुत तेजी से बढ़ेगा। 2010 में जहां दुनिया की 23% आबादी अत्यधिक गर्मी झेल रही थी, वहीं यह आंकड़ा जल्द ही 41% तक पहुंच सकता है। कुछ देशों जैसे सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक, नाइजीरिया, साउथ सूडान, लाओस और ब्राजील में गर्मी का असर बहुत तेजी से बढ़ेगा। वहीं, भारत, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, पाकिस्तान, नाइजीरिया और फिलीपींस जैसे घनी आबादी वाले देशों में सबसे ज्यादा लोग गर्मी से प्रभावित होंगे।
यह स्टडी 'नेचर सस्टेनेबिलिटी' जर्नल में छपी है। इसमें बताया गया है कि ठंडे देशों को भी गर्मी से राहत नहीं मिलेगी। अगर तापमान 2 डिग्री सेल्सियस बढ़ा, तो ऑस्ट्रिया और कनाडा जैसे देशों में गर्म दिनों की संख्या दोगुनी हो जाएगी। यूके, स्वीडन और फिनलैंड में ऐसे दिनों में करीब 150% की बढ़ोतरी होगी, जबकि नॉर्वे और आयरलैंड में यह बढ़ोतरी 200% या उससे भी ज्यादा हो सकती है।
स्टडी के मुख्य लेखक, डॉ. जीसस लिजाना, इंजीनियरिंग साइंस के एसोसिएट प्रोफेसर हैं। वह बताते हैं कि गर्मी और सर्दी की मांग में ज्यादातर बदलाव 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा पार करने से पहले ही हो जाएंगे। इसका मतलब है कि हमें गर्मी से निपटने के लिए तैयारी अभी से शुरू करनी होगी।
ठंडे देशों में बने घर और इमारतें ज्यादा गर्मी झेलने के लिए नहीं बनी हैं। इसलिए, आने वाले कुछ सालों में लाखों घरों को एयर कंडीशनिंग लगवाने की जरूरत पड़ सकती है।
ऑक्सफोर्ड के विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि अगर तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा बढ़ा, तो इसके स्वास्थ्य, शिक्षा, खेती और लोगों के एक जगह से दूसरी जगह जाने पर बहुत बड़े असर होंगे। साथ ही, दुनिया भर में AC और बिजली की मांग भी बहुत बढ़ जाएगी।


