मुंबई : अगर "देवा" ने चाहा तो शिवसेना यूबीटी का मेयर बन सकता है - उद्धव ठाकरे 

Mumbai: If "Deva" wishes, Shiv Sena can become the mayor of UBT - Uddhav Thackeray

मुंबई : अगर

देश की सबसे अमीर महानगरपालिका बीएमसी के चुनाव नतीजे घोषित हो चुके हैं लेकिन मुंबई में राजनीति सरगर्मी जोरों पर है। इसकी वजह है कि मुंबई के मेयर की कुर्सी पर कौन बैठेगा? बीएमसी चुनावों हराने के बाद भी उद्धव ठाकरे दो इक्के लेकर बैठे हैं। उनका कहना है कि अगर "देवा" ने चाहा तो शिवसेना यूबीटी का मेयर बन सकता है। ठाकरे ही इस दलील के बाद से वार्ड 121 से जीतीं प्रियदर्शिनी ठाकरे सुर्खियों में आ गई हैं। उन्हें इंटरनेट पर खूब खोजा जा रहा है। दरअसल, मुंबई में सिर्फ ठाकरे की पार्टी के पास ही दो अनुसूचित जनजाति  से आने वाले दो नगर सेवक हैं।

मुंबई : देश की सबसे अमीर महानगरपालिका बीएमसी के चुनाव नतीजे घोषित हो चुके हैं लेकिन मुंबई में राजनीति सरगर्मी जोरों पर है। इसकी वजह है कि मुंबई के मेयर की कुर्सी पर कौन बैठेगा? बीएमसी चुनावों हराने के बाद भी उद्धव ठाकरे दो इक्के लेकर बैठे हैं। उनका कहना है कि अगर "देवा" ने चाहा तो शिवसेना यूबीटी का मेयर बन सकता है। ठाकरे ही इस दलील के बाद से वार्ड 121 से जीतीं प्रियदर्शिनी ठाकरे सुर्खियों में आ गई हैं। उन्हें इंटरनेट पर खूब खोजा जा रहा है। दरअसल, मुंबई में सिर्फ ठाकरे की पार्टी के पास ही दो अनुसूचित जनजाति  से आने वाले दो नगर सेवक हैं। इनमें वार्ड 121 से जीतीं प्रियदर्शिनी ठाकरे और वार्ड 53 (ओशिवारा-कांदिवली ईस्ट) से जीते जितेंद्र वलवी शामिल हैं। ऐसे में 22 जनवरी को होने वाली लॉटरी पर निगाहें टिकी हैं कि अगर इसमें मेयर की कुर्सी अनुसूचित जाति के लिए रिजर्व हुई तो प्रियदर्शिनी ठाकरे मेयर बन जाएगी। हालांकि ऐसी स्थिति में जितेंद्र वलवी का भी नंबर लग सकता है। इस अजीबोगरीब संयोग ने बीजेपी और शिवसेना की धड़कनें बड़ा रखी हैं।

 

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क्या हैं बीएमसी का लॉटरी फैक्टर?
बीएमसी में 227 सीटें हैं। बहुमत के लिए 114 सीटों की जरूरत होती है। महायुति गठबंधन के पास 118 कॉर्पोरेटर हैं। उद्धव ठाकरे और मनसे के 71 पार्षद हैं हैं। कागज पर महायुति आराम से आगे है, लेकिन मेयर पद की लॉटरी ने तनाव बढ़ा रखा है, क्योंकि मेयर का पद सिर्फ संख्याओं से तय नहीं होता। यह आरक्षण लॉटरी पर निर्भर करता है। इसके दो इक्के उद्धव ठाकरे के पास हैं। 22 जनवरी को लॉटरी तय करेगी कि मेयर का पद एससी, ओबीसी, या एसटी कैटेगरी के लिए आरक्षित होगा या नहीं। पिछली बार यह पद खुला (सामान्य) था, लेकिन इस साल यह रोटेट होगा। बीजेपी और शिवसेना के पास एससी  और ओबीसी से आने वाले नगरसेवक हैं। एसटी आरक्षण आने पर पर खेल पलट सकता है। अगर लॉटरी में एसटी निकलता है, तो सिर्फ़ यूबीटी उम्मीदवार ही योग्य होंगे, जिससे बहुमत होने के बावजूद महायुति प्रभावी रूप से किनारे हो जाएगी।

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क्या हैं बीजेपी की तैयारी?
ठाकरे ने बीएमसी नतीजे घोषित होने के बाद अगले दिन कहा था कि अगर भगवान की मर्जी होगी तो उनका मेयर बन सकता है। उनकी यह टिप्पणी एक सोचा-समझा संकेत था कि उनकी पार्टी की किस्मत लॉटरी सिस्टम पर टिकी है। अगर एसटी  कैटेगरी निकलती है, तो महायुति का संख्यात्मक फायदा खत्म हो जाएगा। और यूबीटी अल्पसंख्यक होने के बावजूद मेयर का पद हासिल कर सकती है। जैसे-जैसे लॉटरी की तारीख निकट आ रही है, वैसै-वैसे रोमांच बढ़ता जा रहा है। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि बीजेपी इस संभावना पर विचार कर रही है कि चूंकि पिछली चुनी हुई बॉडी का कार्यकाल 2022 में खत्म हो गया था। इसके बाद साढ़े तीन साल का कार्यकाल प्रशासक के हवाले रहे। ऐसे में नए सिरे से रोटेशन की लॉटरी की जाए। बीजेपी कोई रिस्क न लेते हुए ऐसा आग्रह चुनाव आयोग से कर सकती है। ऐसे में 21 जनवरी की राजनीतिक हलचल काफी अहम हो गई है। अंतिम बार लॉटरी 2019 में निकली थी।

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