इसरो: हमें गौरवान्वित करता रहेगा
कुलिन्दर सिंह यादव
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (इसरो) का लैंडर विक्रम से संपर्क नहीं हो पाया है | सॉफ्ट लैंडिंग में असफल रहने पर चांद पर गिरे लैंडर का जीवनकाल शनिवार को समाप्त हो गया | अभी तक विश्व के मात्र तीन देशों ने ही चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग कराई है | जिनमें अमेरिका, रूस और चीन शामिल हैं | शत-प्रतिशत मिशन सफल ना होने के बाद इसरो अब गगनयान मिशन की तैयारी में जुट गया है | गगनयान भारत का पहला अंतरिक्ष मिशन है | जिसमें तीन भारतीय अंतरिक्ष यात्री सात दिनों के लिए अंतरिक्ष में जाएंगे | इसरो ने अपनी स्पेस मिशन गगनयान के लिए अंतरिक्ष यात्रियों का चुनाव कर लिया है | जिसे इंस्टिट्यूट ऑफ एयरस्पेस मेडिसिन में भारतीय वायु सेना की सहायता से किया गया |
चंद्रयान-द्वितीय भारत का पहला मिशन था जिसमें चंद्रमा की सतह पर लैंडिंग कराने का प्रयास किया गया | इससे पहले 2008 में चंद्रयान-प्रथम में चांद की परिक्रमा करने के लिए एक स्पेसक्राफ्ट भेजा गया था | चंद्रयान प्रथम मिशन के माध्यम से ही सर्वप्रथम चंद्रमा पर पानी का साक्ष्य संपूर्ण विश्व के सामने प्रस्तुत किया गया था | बाद में अन्य अंतरिक्ष एजेंसियों ने भी इस बात की पुष्टि की | चंद्रयान-2 मिशन में आर्बिटर के साथ विक्रम लैंडर और प्रज्ञान रोवर भी था | लेकिन लैंडर सफल तरीके से चांद की सतह पर उतर नहीं पाया | इसलिए यह मिशन पूरी तरह से सफल नहीं हो सका | आर्बिटर आज भी चांद का चक्कर लगा रहा है और अपने कैमरे के माध्यम से नई-नई जानकारियां इसरो और संपूर्ण विश्व को पहुंचा रहा है |
गगनयान मिशन की बात करें तो दोनों मिशन अपने आप में अलग हैं | जहां चंद्रमा में सॉफ्ट लैंडिंग करानी थी वही गगनयान में अंतरिक्ष यात्रियों को ले जाना और वापस लाना महत्वपूर्ण होगा | गगनयान मिशन के लिए इसरो ने लगभग सभी टेस्ट पूरे कर लिए हैं | क्रू मॉड्यूल का भी सफलतापूर्वक परीक्षण हो चुका है | गगनयान मिशन से पहले इसरो बिना अंतरिक्ष यात्रियों के दो परीक्षण करेगा | जिसका उद्देश्य जीवन रक्षक प्रणाली का परीक्षण करना है जो अभी तक इसरो द्वारा कभी नहीं किया गया है | उसके बाद गगनयान मिशन को भेजा जाएगा | जिससे अंतरिक्ष यात्रियों को सफलतापूर्वक वापस लाया जा सके | मानव मिशन होने के कारण इस मिशन की महत्ता और भी बढ़ गई है | इसरो ने अंतरिक्ष यात्रियों की ट्रेनिंग के लिए रूस की संघीय अंतरिक्ष एजेंसी रॉसकॉसमॉस से समझौता किया है | जिससे इस मिशन में किसी भी प्रकार की कोई कमी ना रह जाए | इसरो के अगले कुछ मिशन बहुत ही महत्वपूर्ण हैं | जिनमें आदित्य एल-1, मंगलयान-2 और शुक्रयान शामिल हैं | इसमें शुक्रयान ऐसा मिशन है जिस पर कोई भी देश अभी तक नहीं पहुंचा है |
बहुत सारे लोग इसरो की आंशिक असफलता पर आलोचना कर रहे हैं | उनको यह समझना चाहिए कि यदि इसरो किसी अन्य देश से जिसने चंद्रमा पर सफलतापूर्वक लैंड किया है | उसकी तकनीक को खरीदता तो इसरो भी उन देशों की श्रेणी में शामिल तो हो जाता | जिन्होंने चंद्रमा पर सफलतापूर्वक लैंड किया है | उस स्थिति में भारत को कुछ सीखने को नहीं मिलता और हमेशा किसी अन्य देश पर निर्भर रहना पड़ता | इस आंशिक असफलता के बाद इसरो के वैज्ञानिक और बेहतर ढंग से कार्य करेंगे और उन खामियों को दूर करेंगे | जिन तकनीकी समस्याओं के कारण यह मिशन शत प्रतिशत सफल नहीं हो पाया | हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अंतरिक्ष में सफलता का प्रतिशत मात्र 33 है और भारत का इसरो इसमें भी अन्य देशों से बेहतर स्थिति में है |
इसरो के सफर की बात की जाए तो इसरो की स्थापना 15 अगस्त 1969 को विक्रम अंबला साराभाई द्वारा की गई थी | इसका मुख्यालय बेंगलुरु में है और वर्तमान समय में इसके प्रमुख के सिवान हैं | इसरो ने अपने स्थापना से लेकर आज तक के कार्यकाल में कई सारे महत्वपूर्ण मिशनों को सफल बनाया है | इसरो के मिशनो के बल पर ही आज हम इंटरनेट के क्षेत्र में, प्राकृतिक आपदा पूर्वानुमान के क्षेत्र में, कृषि के क्षेत्र में, शिक्षा के क्षेत्र में, वन संरक्षण के क्षेत्र में काफी आगे निकल चुके हैं | हालांकि असफलता भी इसरो के साथ जुड़ी हुई है | इसरो की इस सफलता में भारतीय उद्योगों का भी योगदान प्रमुख रहा है | भारतीय उद्योग इसरो के रॉकेट निर्माण से लेकर अन्य कई सारी निर्माण जरूरतों को पूरा करते हैं | पीएसएलवी, जीएसएलवी आदि इसके सफल उदाहरण हैं | इसरो के मिशनों के लिए आवश्यक सामग्रियों का 90% भाग प्राइवेट कंपनियां बनाती हैं | जिनके इंजीनियरों को समय-समय पर इसरो द्वारा प्रशिक्षित किया जाता है | मेक इन इंडिया में सबसे ज्यादा भागीदारी करने वाला संस्थान इसरो है | इसरो का प्रयास रहता है कि उसके जो भी मिशन हो वह कम लागत के हो और पर्यावरण अनुकूल हो | इसमें इसरो के प्रोजेक्ट डिजाइनरों से लेकर टेक्नीशियनो और इंजीनियरों का महत्वपूर्ण योगदान होता है | इन सबके अतिरिक्त इसरो क्षमता निर्माण पर भी कार्य कर रहा है | इसके लिए इसरो ने कई सारे कार्यक्रमों की शुरुआत की है | उदाहरण के लिए आप युविका प्रोग्राम को देख सकते हैं | इसरो का लक्ष्य है कि भारत की आने वाली पीढ़ी भी इसरो के माध्यम से नए-नए कीर्तिमान बना सके | भारतीय युवाओं को प्रशिक्षित करने के साथ-साथ इसरो सार्क देशों के छात्रों को भी प्रशिक्षित करने का कार्यक्रम चला रहा है | जिससे अन्य देश भी अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में आगे बढ़ सके |
अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से भी इसरो अपने कई सारे प्रोजेक्ट चला रहा है | जिसमें जापान, फ्रांस और रूस कि अंतरिक्ष एजेंसियों के साथ इसरो का रिश्ता अटूट है | इसके अतिरिक्त इसरो नासा के साथ मिलकर निसार प्रोजेक्ट पर कार्य कर रहा है | जो अपनी तरह का पहला रडार होगा इससे पूरी पृथ्वी को कवर किया जा सकता है | इससे जलवायु परिवर्तन को समझने में मदद मिलेगी | इसरो के आने वाले मिशन और भी महत्वपूर्ण हैं और हम भारतीयों को उम्मीद ही नहीं पूर्ण विश्वास भी है कि इसरो आगे इसी तरह से नए-नए कीर्तिमान बनाता रहेगा | जिससे पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में और मानव हित में भारत अपना बेहतर योगदान दे सकेगा |


