पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों का संकट... 2021 से अब तक 500 से अधिक लड़कियों का जबरन धर्म परिवर्तन

The Crisis of Minorities in Pakistan: Over 500 Girls Forcibly Converted Since 2021

पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों का संकट...  2021 से अब तक 500 से अधिक लड़कियों का जबरन धर्म परिवर्तन

पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा पर गहरा संकट मंडरा रहा है। मानवाधिकार संगठन वॉयस ऑफ पाकिस्तान माइनॉरिटी ने अपनी ताजा रिपोर्ट में बेहद चिंताजनक खुलासे किए हैं। पाकिस्तान में जबरन धर्मांतरण का चलन दिखाती हैं कि कैसे सैकड़ों लड़कियों को उनके परिवारों से छीन लिया गया है। यह स्थिति समाज के हाशिए पर जी रहे इन समुदायों की असुरक्षा और संस्थागत विफलता को स्पष्ट रूप से दर्शाती है।

पाकिस्तान : पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा पर गहरा संकट मंडरा रहा है। मानवाधिकार संगठन वॉयस ऑफ पाकिस्तान माइनॉरिटी ने अपनी ताजा रिपोर्ट में बेहद चिंताजनक खुलासे किए हैं। पाकिस्तान में जबरन धर्मांतरण का चलन दिखाती हैं कि कैसे सैकड़ों लड़कियों को उनके परिवारों से छीन लिया गया है। यह स्थिति समाज के हाशिए पर जी रहे इन समुदायों की असुरक्षा और संस्थागत विफलता को स्पष्ट रूप से दर्शाती है।

रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2021 से 2025 के बीच कुल 515 मामले दर्ज किए गए हैं। इन आंकड़ों में 69 प्रतिशत हिंदू लड़कियां और 31 प्रतिशत ईसाई समुदाय की लड़कियां शामिल हैं। वीओपीएम का कहना है कि हर एक नंबर एक मानवीय त्रासदी और डरे हुए परिवार की कहानी है।

पीड़ितों की उम्र को लेकर संस्था ने बहुत ही गंभीर और चिंताजनक आंकड़े पेश किए हैं। रिपोर्ट बताती है कि 52 प्रतिशत पीड़ित लड़कियां 14 से 18 साल के बीच की आयु की हैं। इसके अलावा 20 प्रतिशत पीड़ित ऐसी हैं जिनकी उम्र महज 14 साल से भी कम है।

अल्पसंख्यक परिवारों के लिए अपनी बेटियों के अपहरण के बाद इंसाफ पाना एक बहुत बड़ा संघर्ष है। अक्सर माता-पिता को बताया जाता है कि उनकी नाबालिग बेटी ने अपनी मर्जी से धर्म बदला है। कार्यकर्ताओं का सवाल है कि नाबालिग की मर्जी का कानूनी और नैतिक आधार आखिर क्या हो सकता है।

कुछ मामलों में तो स्थानीय अदालतों ने भी इन जबरन शादियों और धर्म परिवर्तन को वैध माना है। सेंटर फॉर सोशल जस्टिस ने भी इस मुद्दे की गंभीरता को बताते हुए सैकड़ों मामले दर्ज किए हैं। परिवारों के पास कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए न तो पर्याप्त संसाधन हैं और न रसूख।

इस गंभीर मुद्दे पर समाज और मीडिया की चुप्पी अल्पसंख्यकों को और अधिक अलग-थलग कर देती है। कोई मामला सोशल मीडिया पर थोड़ी देर के लिए तो चर्चा में आता है पर जल्द गायब हो जाता है। यह खामोशी दोषियों को बढ़ावा देती है और पीड़ितों के घावों को और गहरा कर देती है।

अब समय आ गया है कि पाकिस्तान में कानून को और अधिक सख्त और पारदर्शी बनाया जाए। संस्थाओं की जवाबदेही तय करना और नाबालिगों को मजबूत कानूनी सुरक्षा देना आज की सबसे बड़ी जरूरत है। समाज को इन अनसुनी आवाजों को सुनने और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आगे आना होगा।