30 साल पहले अपने माता-पिता से बिछड़ने के बाद सोशल मीडिया पर उन्हें खोजने के लिए कैंपेन शुरू किया

After getting separated from his parents 30 years ago, he started a campaign on social media to find them

30 साल पहले अपने माता-पिता से बिछड़ने के बाद सोशल मीडिया पर उन्हें खोजने के लिए कैंपेन शुरू किया

आपने कभी उन बच्चों का दर्द महसूस किया है, जो बहुत छोटी उम्र में अपने माता-पिता से बिछड़ जाते हैं। ऐसे बच्चे अपने अभिभावकों को खोजने के तमाम प्रयास करते हैं, लेकिन जब उनके प्रयासों का कोई नतीजा नहीं निकलता, तो वे हिम्मत हारकर शांत बैठ जाते हैं। फिलहाल बेंगलुरु में कार्यरत डॉ. आदित्य चरेगांवकर हालांकि उन लोगों में से नहीं हैं, जिन्होंने अपने बिछड़े हुए मां-बाप से दोबारा मिल पाने की आस छोड़ दी है।

मुंबई : आपने कभी उन बच्चों का दर्द महसूस किया है, जो बहुत छोटी उम्र में अपने माता-पिता से बिछड़ जाते हैं। ऐसे बच्चे अपने अभिभावकों को खोजने के तमाम प्रयास करते हैं, लेकिन जब उनके प्रयासों का कोई नतीजा नहीं निकलता, तो वे हिम्मत हारकर शांत बैठ जाते हैं। फिलहाल बेंगलुरु में कार्यरत डॉ. आदित्य चरेगांवकर हालांकि उन लोगों में से नहीं हैं, जिन्होंने अपने बिछड़े हुए मां-बाप से दोबारा मिल पाने की आस छोड़ दी है। 34 साल के आदित्य 30 वर्ष पहले अपने मां-बाप से बिछड़ गए थे और अब 3 दशक बाद उन्होंने अपने मां-बाप को खोजने के लिए सोशल मीडिया पर कैंपेन शुरू किया है। 

मुंबई में बिछड़ा था परिवार
चरेगांवकर ने बताया कि वह 4 साल की उम्र में मुंबई में अपने मां-बाप से बिछड़ गए और किसी ने उसे चिल्ड्रेन ऐड सोसायटी में छोड़ दिया। उस वक्त आदित्य को सिर्फ इतना याद था कि उसके घर में एक दादी हैं, जो उसे बहुत प्यार करती है। उसे सनी नाम से पुकारा जाता है। कुछ दिन के बाद उसे मानखुर्द के आशा सदन में ट्रांसफर किया गया। यह बच्चों का एडॉप्शन सेंटर है। आदित्य को संस्था वालों ने इसलिए किसी को गोद नहीं दिया क्योंकि वह अपना नाम बता पा रहा था। अपनी दादी के बारे में बता पा रहा था, लेकिन उसे यह याद नहीं था कि वह किस इलाके से लापता हुआ है।
दो महीने बाद ही उसे पुणे के SOS चिल्ड्रन विलेज में भेजा दिया गया। संस्था की संचालिका ने यहां पर सनी को आदित्य का नाम दिया। उसने पुणे, कोल्हापुर, नांदेड से स्कूली शिक्षा पूरी की। सतारा से सोशल वर्क में ग्रैजुएशन करने के बाद मास्टर्स की डिग्री हासिल की। इसी बेसिस पर आदित्य को फेलोशिप मिली।

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राजस्थान में किया स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में काम
आदित्य 2 साल की फैलोशिप के तहत राजस्थान (उदयपुर) के झुंझुनू गए। वहां पर उन्होंने स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में काम किया। फेलोशिप को पूरा करने के बाद आदित्य ने मुंबई में स्थित टाटा इंस्टीट्यूट आफ सोशल साइंस से एम फील की पढ़ाई की और फिर पीएचडी किया। आदित्य बताते है कि पीएचडी की पढ़ाई के लिए उनके पास पैसे नही थे। कुछ पैसे उसे फेलोशिप करने पर मिले थे और कुछ पैसे शुभचिंतकों ने दिए। वह अपना गुजारा करने के लिए पीएचडी के अन्य स्टूडेंट्स की भी थीसिस लिखा करते थे।

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आदित्य ने बताया कि पीएएचडी पूरी करने के बाद उसे बेंगलुरु में अजीम प्रेमजी के एनजीओ में नौकरी मिल गई, लेकिन उसके मन में चौबीसों घंटे एक ही सवाल कौंधता रहता है कि आखिर उसके माता पिता कौन है। आदित्य की परवरिश और देखभाल में जो लोग भी शामिल थे सभी ने उसे प्रोत्साहित किया कि वह फेसबुक पर कैंपेन चलाए। आदित्य शर्मिला सहस्त्रबुद्धे, सीनियर इंस्पेक्टर मिसिंग ब्यूरो, मुंबई और नासिक में तैनात इंस्पेक्टर सीमा परिहार का शुक्रिया अदा करना नही भूलते।

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