पालघर के आदिवासी क्षेत्रों में १९९२ में शुरू हुई इस योजना में पिछले ३१ सालों से कोई बदलाव नहीं...
Started in 1992 in the tribal areas of Palghar, there has been no change in this scheme for the last 31 years...
पालघर के आदिवासी क्षेत्रों में साक्षरता दर बढ़ाने के नाम पर भद्दा मजाक हो रहा है। यहां सिस्टम की लाचारी शिक्षा पर भारी पड़ रही है। आदिवासी छात्राओं को रोजाना स्कूल जाने के लिए महज एक रुपए मिलता है। हैरानी वाली बात यह है कि ३ जनवरी, १९९२ में शुरू हुई इस योजना में पिछले ३१ सालों से कोई बदलाव नहीं हुआ है।
पालघर : पालघर के आदिवासी क्षेत्रों में साक्षरता दर बढ़ाने के नाम पर भद्दा मजाक हो रहा है। यहां सिस्टम की लाचारी शिक्षा पर भारी पड़ रही है। आदिवासी छात्राओं को रोजाना स्कूल जाने के लिए महज एक रुपए मिलता है। हैरानी वाली बात यह है कि ३ जनवरी, १९९२ में शुरू हुई इस योजना में पिछले ३१ सालों से कोई बदलाव नहीं हुआ है।
यह हाल तब है जब महाराष्ट्र के आदिवासी क्षेत्रों की साक्षरता दर औसत दर्जे से भी काफी कम है। आदिवासी क्षेत्रों में महिलाओं की शिक्षा को लेकर काम कर रहे कई कार्यकर्ता प्रोत्साहन भत्ते के नाम पर हो रहे मजाक से नाराज हैं। उनका कहना है कि इतने पैसे में आदिवासी छात्र एक पेंसिल तक नहीं खरीद सकते। वाकई यह बेहद गंदा मजाक है।
बता दें कि १९९२ में दुर्गम इलाके में रहनेवाली १ से ४ कक्षा की बच्चियों को पढ़ाई के लिए प्रोत्साहन के लिहाज से एक रुपए दैनिक भत्ते की स्कीम शुरू की गई थी, जो उन्हें दस महीने दी जाती है, ताकि साक्षरता दर में बढ़ोतरी हो। हालांकि, समय के साथ बढ़ती महंगाई में भी इस भत्ते को रोजाना एक रुपए और महीने में २२ रुपए बरकरार रखा गया, जबकि इसी समय अंतराल में सरकारी कर्मचारियों की सैलरी में चौगुनी बढ़ोतरी हुई।
उधर विधायकों और सांसदों की सैलरी को ७५ हजार से डेढ़ लाख रुपए कर दिया गया लेकिन आदिवासी छात्राओं के भविष्य को लेकर एक बार भी विचार नहीं किया गया, जबकि बढ़ती महंगाई में आदिवासियों को अपने बच्चों को पढ़ाना मुश्किल हो रहा है।
एक आदिवासी छात्रा के पिता ने एक रुपए के गुजारा भत्ते को मूर्खतापूर्ण और शर्मनाक बताते हुए कहा कि बच्चियों को स्कूल भेजने के लिए इनके माता-पिता को एक साल में महज २२० रुपए के करीब ही मिलते हैं, जबकि पढ़ाई-लिखाई के लिए लगनेवाली सामग्रियों के दाम आसमान छू रहे हैं।
आदिवासियों के लिए काम करनेवाले काष्ट्रकरी संगठन के प्रमुख ब्रायन लोबो का कहना है कि अगर वाकई केंद्र और राज्य सरकार ‘बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओं’ व आदिवासी छात्राओं के बीच साक्षरता दर में सुधार के लिए गंभीर है तो उनके भत्ते में तुरंत इजाफा करना चाहिए और प्रोत्साहन भत्ता सभी छात्राओं को तय समय में मिले इसकी व्यवस्था करनी चाहिए।


