इंडो-अफ्रीका संबंधों में नई चुनौतियां
संवादाता : कुलिन्दर सिंह यादव
हाल ही में अफ्रीका महादेश में भारत के दो महत्वपूर्ण व्यक्तियों का दौरा रहा जिसमें राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद जी तथा रक्षामंत्री राजनाथ सिंह शामिल हैं जहां राष्ट्रपति ने बेनिन गांबिया और गुयाना की यात्रा की वहीं रक्षा मंत्री ने पूर्वी अफ्रीका के देश मोजांबिक की यात्रा की | यह भारत की नई अफ्रीका नीति को दर्शाता है जो स्वागत योग्य है पिछले पांच वर्षों में भारतीय नेतृत्व द्वारा 29 यात्रा अफ्रीका महाद्वीप की की गई है इसके साथ-साथ वर्ष 2015 में भारत-अफ्रीका सम्मेलन में 41 अफ्रीकी देशों के प्रतिनिधियों ने भारत की यात्रा की और भारत ने अगले 5 वर्षों में अफ्रीका में 10 बिलियन डालर सहायता राशि देने की घोषणा की | हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2017 तक भारत आठ अरब डालर का ऋण 44 अफ्रीकी देशों को 152 परियोजनाओं के लिए दे चुका है | इसके अतिरिक्त भारत ने 33 अफ्रीकी देशों को भारतीय बाजारों तक मुक्त पहुंच उपलब्ध कराई है वित्तीय वर्ष 2018-19 में भारत का 63 अरब डालर का व्यापार अफ्रीका के साथ रहा जिनमें भारत में ज्यादातर आयात ही किया है और इसके साथ भारत अफ्रीका का तीसरा बड़ा व्यापारिक साझेदार बन गया है |
लगभग पांच हजार से अधिक भारतीय सैनिक संयुक्त राष्ट्र के शांति मिशनो में अफ्रीका में कार्य कर रहे हैं इसके साथ भारत लगातार इन शांति मिशनो में अपनी आर्थिक भागीदारी भी सुनिश्चित कर रहा है इन सब योगदान के साथ-साथ भारत सरकार समस्त अफ्रीकी छात्रों को जो भारत में शिक्षा ग्रहण करने के लिए आते हैं उनको छात्रवृत्ति भी उपलब्ध कराता है इससे भारत-अफ्रीका के प्रगाढ़ संबंधों का पता चलता है |
मौजूदा परिदृश्य में हमें अपने हितों को भी देखना आवश्यक हैं इसमें जो आर्थिक सहायता हम अफ्रीका को दे रहे हैं उससे कुछ आर्थिक लाभ हमें भी होना चाहिए लेकिन अभी तक ऐसा नहीं हो पा रहा है जो भारतीय अफ्रीका में काम करते हैं वह भेदभाव के शिकार हो रहे हैं जिस तरह से सम्मान फ्रांस, ब्रिटेन और चीन के नागरिकों को मिल रहा है भारतीयों के परिपेक्ष में ऐसा नहीं है अभी हाल ही में घाना में महात्मा गांधी की मूर्ति को हटाया गया इसकी मांग बड़े दिनों से वहां के नागरिक कर रहे थे इसी तरह के भेदभाव के शिकार भारतीय व्यवसाई वर्ग है जो वहां पर लोगों को रोजगार दे रहे हैं हर प्रकार की सहायता के बाद भी यदि भारतीय नागरिकों के साथ अफ्रीका में इस तरह का भेदभाव किया जाए तो यह भारतीय शीर्ष नेतृत्व को सोचने पर विवश करता है अवश्य ही हमारी नीतियों में कुछ खामियां हैं जिसकी वजह से वहां की स्थानीय जनता में भारत के खिलाफ रोष है | भारत कोई धनी देश तो है नहीं की हम अपने लोगों की चिंता को छोड़कर बाहर बिना शर्तों के दान देते रहें भारत की साठ फ़ीसदी आबादी कुपोषण का शिकार है हमारे यहां स्वास्थ्य सेवाएं ग्रामीण क्षेत्रों में नहीं पहुंच पाई हैं आधारभूत संरचनाओं की भी कमी है इसलिए हमें अपनी अफ्रीका नीति में सुधार करने की आवश्यकता है साथ ही अफ्रीका को भी भारतीय हितों के बारे में समझना चाहिए |
हमें यह विचार करने की आवश्यकता है कि अफ्रीका में इतने भारी निवेश के बाद हमें अफ्रीका से कितने प्रोजेक्ट मिले जैसा कि अन्य निवेशक देशों को मिले हैं यदि हमें नहीं मिले हैं तो हमने क्या गलतियां की हैं ? इस पर अब अवश्य ही ध्यान देने की आवश्यकता है अब हमें अफ्रीका नीति में क्या करना चाहिए इस पर मेरे विचार में सर्वप्रथम अभी तक हम जो भी सहायता उपलब्ध कराते रहे हैं वह विभिन्न अफ्रीकी संगठनों को देते रहें और संगठनों के माध्यम से वह सहायता राशि देशों को उपलब्ध हो पाती थी लेकिन अब आवश्यकता है कि हमें विभिन्न संगठनों को छोड़कर द्विपक्षीय संबंधों के माध्यम से सहायता राशि मुहैया करानी चाहिए जिससे संबंधित देश से हम बदले में कुछ पा सके इसके साथ एक और अहम बात है अब हमें किसी भी देश के प्रोजेक्ट में शत-प्रतिशत धन नहीं लगाना चाहिए उसमें संबंधित देश को उसके स्वयं के आर्थिक सामर्थ्य के अनुसार शामिल करना चाहिए और प्रत्येक प्रोजेक्ट में संबंधित देश में जो भी भारतीय राजदूत हैं उनको भी इससे जोड़ना चाहिए ऐसा करने से आपसी संबंध और मजबूत होंगे और इसके बदले में हमें नया बाजार, कच्चा माल या अन्य संसाधनों तक पहुंच मिल सकेगी जिससे अन्य निवेशक देशों की तरह भारत को भी कुछ आर्थिक लाभ हो सकेगा जो अभी तक शून्य है द्विपक्षीय आर्थिक समझौतों से संबंधित देश के नागरिकों को भी यह पता चलेगा कि उनके देश में विकासात्मक गतिविधियों में कौन सा देश हिस्सेदार है जिससे भारतीयों के प्रति उनकी नाराजगी कम हो सकेगी और अन्य देशों के नागरिकों के समान ही भारतीय नागरिकों को अफ्रीका में सम्मान मिल सकेगा अभी तक जो आर्थिक सहायता भारत सरकार अफ्रीकी संगठनों के माध्यम से उपलब्ध कराती थी उसमें संबंधित देश के नागरिकों को यह नहीं पता हो पाता था कि उनके यहां चल रही विकास गतिविधियों में कौन सा देश साझेदार है यह हमारी बहुत बड़ी गलती थी अब हमें इस को सुधारने की आवश्यकता है |
इस मुद्दे को समग्रता से अध्ययन करने पर यह निष्कर्ष निकलता है की एक जिम्मेदार राष्ट्र होने के नाते कुछ हमारी जिम्मेदारियां भी बनती हैं हमें अपने जिम्मेदारियों का निर्वहन भी करना है सब कुछ लाभ के लिए नहीं किया जाता लेकिन समय की मांग है कि इन सब में सामंजस्य बनाकर चला जा जिससे भारत की अर्थव्यवस्था पर कोई नकारात्मक प्रभाव ना पड़े और अफ्रीका के बाजार और संसाधनों की दौड़ में भी अन्य देशों से पीछे ना रह जाए ||


