रॉ एजेन्ट रविन्द्र कौशिकी की जिन्दगी पर बनेगी फिल्म, अनुराग बसु होंगे कमाण्डर
A film will be made on the life of RAW agent Ravindra Kaushiki, Anurag Basu will be the commander
कभी पाकिस्तान में मेजर के पद पर कार्य करते हुए भारत के रॉ एजेन्ट रहे रविन्द्र कौशिक पर अब बॉलीवुड फिल्म बनाने की तैयारी करने जा रहे हैं। अस्सी के दशक में भारत के लिए पाकिस्तान में जासूसी करने वाले इस रॉ एजेन्ट को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने ब्लैक टाइगर का नाम दिया था, जिन्होंने भारत के लिए पाकिस्तान में जासूसी करने के लिए वहाँ के लॉ कॉलेज से लॉ की डिग्री ली थी। बताया जा रहा है कि इस फिल्म के निर्देशन की जिम्मेदारी ख्यातनाम निर्देशक अनुराग बसु को सौंपी गई है, जो दर्शकों को गैंगस्टर, वो लम्बे, मर्डर, बर्फी, जग्गा जासूस, मेट्रो इन लाइफ सरीखी चर्चित और कामयाब फिल्में दे चुके हैं। हालांकि निर्माताओं की ओर से अभी तक इस फिल्म की स्टारकास्ट को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।
बॉलीवुड हंगामा से बातचीत के दौरान अनुराग ने कहा- रंविद्र कौशिक की बायोपिक साहस की कहानी है। उन्होंने 20 की उम्र से ही देश की सुरक्षा के लिए कई ऐसे काम किए, जिससे 70 से 80 के दशक में देश को बहुत फायदा हुआ। हमारे इतिहास का काफी हिस्सा भुला दिया गया है, जिसे हमें जानने की जरूरत है।
रविंद्र कौशिक रॉ यानी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग के जासूस थे, जो इंडियन होकर भी पाकिस्तान आर्मी में मेजर पद पर पहुंचे। रविंद्र का जन्म भारत के पंजाबी परिवार में हुआ। टीनेज से ही रविंद्र को थिएटर में दिलचस्पी थी। इस दौरान रॉ की नजर उन पर पड़ी। मिशन पूरा करने के लिए उन्होंने इस्लाम धर्म भी अपना लिया। 1975 में बतौर जासूस उन्हें पाकिस्तान भेजा गया। वो यहां नबी अहमद शेख बनकर गए थे। पाकिस्तान पहुंचने के बाद उन्होंने कराची के लॉ कॉलेज में एडमिशन लिया और डिग्री भी ली। रविंद्र पाकिस्तान आर्मी में मेजर पद तक पहुंचे। इस बीच पाकिस्तान आर्मी को कभी भी एहसास नहीं हुआ कि उनके बीच भारत का जासूस काम कर रहा है। 1979 से 1983 के बीच कौशिक ने भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को पाकिस्तानी सेना से जुड़ी अहम जानकारियां सौंपी, जो देश के लिए काफी मददगार साबित हुई। रविंद्र द ब्लैक टाइगर के नाम से जाना जाने लगा था। कहा जाता है कि उन्हें ये नाम तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने दिया था।
1983 में रविंद्र का राज खुल गया। कहा जाता है कि उन्होंने भारत सरकार से मदद मांगी, लेकिन उन्हें देश वापसी के लिए मदद नहीं मिली। आखिरकार पाकिस्तानी एजेंसियों ने उन्हें पकडक़र सियालकोट की जेल में कैद कर लिया। इस दौरान उन्हें टॉर्चर किया गया और उन पर कई मुकदमे भी चलाए गए। 2001 में टीबी और हार्ट अटैक की वजह से उनकी मौत हो गई।


