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Read More... मुंबई : प्लेन क्रैश में अजित पवार का निधन, सुप्रिया सुले ने जारी किया पहला बयान, शोक में आज बारामती बंद
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बारामती में प्लेन क्रैश हो गया है जिसमें एनसीपी नेता और डिप्टी सीएम अजित पवार सवार थे. इस हादसे में उनका निधन हो गया. उपमुख्यमंत्री अजित पवार को बुधवार, 28 जनवरी 2026 को बारामती तालुका में जिला परिषद और पंचायत समिति के सार्वत्रिक चुनाव प्रचार के तहत विभिन्न सभाओं को संबोधित करना था. उनका कार्यक्रम सुबह 10 बजे निरावागज से शुरू होना था, इसके बाद दोपहर 12 बजे पंढरे में सभा करना था. दोपहर 3 बजे करंजेपुल में जनसभा को संबोधित करने के बाद उनका अंतिम कार्यक्रम शाम 5:30 बजे सुपा में प्रस्तावित थी. राज ठाकरे की बुरी हार के बाद चर्चा में ये बयान! यहां हुई मनसे चीफ से गलती?
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महाराष्ट्र की राजनीति का केंद्र बने मुंबई नगर निगम चुनावों के नतीजे शुक्रवार, 16 जनवरी 2026 को घोषित कर दिए गए. सुबह 10 बजे वोटों की गिनती शुरू होने के बाद से ही भारतीय जनता पार्टी ने बढ़त बनाते हुए मुंबई नगर निगम में सबसे बड़ी पार्टी बनने में कामयाबी हासिल कर ली. पश्चिम बंगाल में एसआईआर विवाद: मुख्य निर्वाचन अधिकारी का सख्त बयान, शिकायतों को साजिश बताया
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पश्चिम बंगाल में 2026 विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर तनाव चरम पर पहुंच गया है। इसी बीच राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) ने दो पुलिस शिकायतों पर कड़ा ऐतराज जताया है। मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर पोस्ट कर कहा कि विभिन्न प्रेस विज्ञप्तियों से इस कार्यालय को जानकारी मिली है कि भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार और पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज अग्रवाल के खिलाफ पुलिस में दो शिकायतें दर्ज की गई हैं। उप मुख्यमंत्री अजीत पवार के विधानसभा में दिए गए बयान की शिक्षाविदों, रिसर्च गाइड और PhD स्कॉलर्स ने कड़ी आलोचना की
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BARTI, SARTHI, MAHAJYOTI, TRTI और AMRUT जैसे सरकारी संस्थानों से मिलने वाली फेलोशिप को लेकर PhD स्कॉलर्स के बीच बढ़ते असंतोष के बीच, महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री अजीत पवार के विधानसभा में दिए गए बयान कि "एक ही परिवार के पांच से छह सदस्य सिर्फ इसलिए PhD कर रहे हैं क्योंकि उन्हें हर महीने ₹42,000 की फेलोशिप मिलती है", की पूरे राज्य के शिक्षाविदों, रिसर्च गाइड और PhD स्कॉलर्स ने कड़ी आलोचना की है। शिक्षाविदों ने इस टिप्पणी को 'गैर-जिम्मेदाराना' और 'अज्ञानतापूर्ण' बताया है, यह तर्क देते हुए कि यह फेलोशिप भुगतान में लगातार देरी, स्पष्ट नीति की कमी और प्रभावी निगरानी तंत्र की अनुपस्थिति जैसे असली संकट से ध्यान भटकाता है। 
