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                <title>मुंबई : सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र की विभिन्न अदालतों में लंबित मामलों पर व्यक्त की गहरी चिंता; पुलिस आरोपपत्र दाखिल करने के बावजूद आरोपियों के खिलाफ आरोप तय करने में विफल</title>
                                    <description><![CDATA[<p>सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र की विभिन्न अदालतों में लंबित मामलों पर गहरी चिंता व्यक्त की है। कोर्ट को पता चला है कि कम से कम 649 आपराधिक मामलों में सुनवाई शुरू नहीं हुई है क्योंकि पुलिस आरोपपत्र दाखिल करने के बावजूद आरोपियों के खिलाफ आरोप तय करने में विफल रही है, कुछ मामलों में तो 2006 में ही आरोपपत्र दाखिल कर दिए गए थे। जस्टिस संजय करोल और एनके सिंह की पीठ ने 9 अक्टूबर को बॉम्बे हाईकोर्ट रजिस्ट्री द्वारा महाराष्ट्र भर के उन विचाराधीन कैदियों के बारे में दायर हलफनामे का अवलोकन करने के बाद कहा, जिनके खिलाफ वर्षों पहले आरोपपत्र दाखिल किए जाने के बावजूद आरोप तय नहीं किए गए थे।</p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.rokthoklekhani.com/article/45044/mumbai-supreme-court-expresses-deep-concern-over-cases-pending-in"><img src="https://www.rokthoklekhani.com/media/400/2025-10/download---2025-10-29t111735.025.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>मुंबई : </strong>सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र की विभिन्न अदालतों में लंबित मामलों पर गहरी चिंता व्यक्त की है। कोर्ट को पता चला है कि कम से कम 649 आपराधिक मामलों में सुनवाई शुरू नहीं हुई है क्योंकि पुलिस आरोपपत्र दाखिल करने के बावजूद आरोपियों के खिलाफ आरोप तय करने में विफल रही है, कुछ मामलों में तो 2006 में ही आरोपपत्र दाखिल कर दिए गए थे। जस्टिस संजय करोल और एनके सिंह की पीठ ने 9 अक्टूबर को बॉम्बे हाईकोर्ट रजिस्ट्री द्वारा महाराष्ट्र भर के उन विचाराधीन कैदियों के बारे में दायर हलफनामे का अवलोकन करने के बाद कहा, जिनके खिलाफ वर्षों पहले आरोपपत्र दाखिल किए जाने के बावजूद आरोप तय नहीं किए गए थे।</p>
<p> </p>
<p>सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने 9 सितंबर को बॉम्बे उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल को यह बताने का निर्देश दिया था कि जुलाई 2021 में आरोप पत्र दायर होने के बावजूद शुभम गणपति उर्फ ​​गणेश राठौड़ का मुकदमा क्यों शुरू नहीं हुआ। पीठ ने रजिस्ट्रार जनरल को महाराष्ट्र भर के अन्य विचाराधीन कैदियों के बारे में भी जानकारी एकत्र करने का निर्देश दिया था, जिनके आरोप चार या उससे अधिक वर्ष पहले आरोप पत्र दायर किए जाने के बावजूद लंबित रहे। पिंपरी चिंचवाड़ में एक हत्या के मामले में आरोपी राठौड़ को अप्रैल 2021 में गिरफ्तार किया गया था। उसने मई 2025 में बॉम्बे उच्च न्यायालय के 2024 के आदेश को चुनौती देते हुए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था, जिसमें उसे जमानत देने से इनकार कर दिया गया था।</p>
<p>9 सितंबर को राठौड़ की याचिका पर सुनवाई करते हुए, सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने कहा था कि मुकदमे से पहले उसकी लंबी हिरासत संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त त्वरित सुनवाई के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। पीठ ने कहा कि राठौड़ चार साल से ज़्यादा समय से हिरासत में है, फिर भी उसकी स्थिति वैसी ही बनी हुई है जैसी उसकी क़ैद के पहले दिन थी। पीठ ने उच्च न्यायालय को देरी के कारणों का पता लगाने और राज्य भर में इसी तरह के सभी मामलों की जाँच करने का निर्देश दिया।<br />7 अक्टूबर को, उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल ने अनुपालन में एक हलफ़नामा दायर किया।</p>
<p>सर्वोच्च न्यायालय ने हलफ़नामे की विषयवस्तु को चिंताजनक पाया, क्योंकि आरोप तय करने में देरी के मुख्य कारण अभियुक्तों की गैर-हाज़िरी, विभिन्न याचिकाओं और आवेदनों का लंबित रहना, वकीलों की अनुपस्थिति और अभियुक्तों द्वारा आरोपों पर हस्ताक्षर करने से इनकार करना थे। शीर्ष अदालत ने 9 अक्टूबर को कहा, "हलफनामे से पता चलता है कि कम से कम 649 मामले ऐसे हैं जिनमें आरोप पत्र दाखिल होने के बावजूद, वर्ष 2006, 2013, 2014 और उसके बाद से वर्ष 2020 तक, आरोप तय नहीं किए गए हैं।" शीर्ष अदालत ने इस बात पर गौर किया कि उच्च न्यायालय ने इस वर्ष की शुरुआत में ही परिपत्र जारी कर विचाराधीन कैदियों की अनावश्यक स्थगन से बचने के लिए भौतिक या आभासी पेशी अनिवार्य कर दी थी और जानना चाहा था कि क्या उन निर्देशों का अक्षरशः पालन किया जा रहा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>Mumbai</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 29 Oct 2025 11:18:30 +0530</pubDate>
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