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                <title>नई दिल्ली : संपत्ति धोखाधड़ी मामले में सिर्फ खरीदारी ही मुकदमे के लिए काफी नहीं: सुप्रीम कोर्ट</title>
                                    <description><![CDATA[<p>सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के दशकों पुराने एक जाली वसीयत और संपत्ति धोखाधड़ी मामले में आरोपी एक खरीदार के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि विवादित संपत्ति को किसी कीमती चीज के बदले में सिर्फ खरीद लेना, बिना किसी ठोस सबूत के जो दिखाए कि वह जालसाजी या साजिश में शामिल था, उसके खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाने का आधार नहीं बन सकता।</p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.rokthoklekhani.com/article/49556/new-delhi-mere-purchase-is-not-enough-for-trial-in"><img src="https://www.rokthoklekhani.com/media/400/2026-04/download---2026-04-28t182741.806.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>नई दिल्ली : </strong>सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के दशकों पुराने एक जाली वसीयत और संपत्ति धोखाधड़ी मामले में आरोपी एक खरीदार के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि विवादित संपत्ति को किसी कीमती चीज के बदले में सिर्फ खरीद लेना, बिना किसी ठोस सबूत के जो दिखाए कि वह जालसाजी या साजिश में शामिल था, उसके खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाने का आधार नहीं बन सकता। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की एक बेंच ने मद्रास हाई कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें अपीलकर्ता एस. आनंद के खिलाफ 2004 की एक एफआईआर के संबंध में चल रही कार्यवाही को रद्द करने से इनकार कर दिया गया था। </p>
<p> </p>
<p>इस एफआईआर में करूर जिले में एक वसीयत को जाली बनाने और पुश्तैनी संपत्ति की धोखाधड़ी से बिक्री करने का आरोप लगाया गया था। सर्वोच्च न्यायालय ने अपील को स्वीकार करते हुए कहा कि 'सबूत का एक कण भी' ऐसा नहीं था, जिससे संकेत मिले कि अपीलकर्ता ने 12 सितंबर, 1988 की विवादित वसीयत की कथित मनगढ़ंत रचना में कोई भूमिका निभाई थी या खरीद के समय उसे कथित जालसाजी की जानकारी थी। न्यायमूर्ति नाथ की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह टिप्पणी की कि अपीलकर्ता एक मूल्यवान प्रतिफल के बदले विचाराधीन संपत्ति का क्रेता है। उसे वर्तमान मामले के तथ्यों के आधार पर, ऐसा व्यक्ति नहीं माना जा सकता, जिसने कपटपूर्ण प्रलोभन दिया हो।</p>
<p>यह मामला शिकायतकर्ता के उन आरोपों से जुड़ा है कि उसके दिवंगत भाई ने अन्य आरोपियों के साथ मिलकर साजिश रचते हुए, उनके पिता की वसीयत को जाली बनाया और उसका इस्तेमाल करके खरीदारों (जिनमें अपीलकर्ता भी शामिल है) के पक्ष में बिक्री विलेख (सेल डीड) निष्पादित किए। इस प्रकार, उसने वैध वारिसों को उनके संपत्ति अधिकारों से वंचित कर दिया। पुलिस ने जांच के बाद एक चार्जशीट दायर की, जिसमें संपत्ति के खरीदारों सहित कई आरोपियों पर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 467, 468, 471, 420 और 120-बी के तहत अपराधों का आरोप लगाया गया।</p>
<p>सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री की जांच करते हुए यह दर्ज किया कि अपीलकर्ता का न तो कथित जाली वसीयत बनाने से कोई संबंध था और न ही वह उन पिछली लेन-देन में कोई पक्षकार था, जो अभियोजन पक्ष के षड्यंत्र सिद्धांत का आधार बनी थीं। शीर्ष अदालत ने संपत्ति विवादों में आपराधिक दायित्व को नियंत्रित करने वाले स्थापित सिद्धांतों को दोहराते हुए यह माना कि किसी 'बोना फाइड' (सद्भावपूर्ण) खरीदार के खिलाफ धोखाधड़ी के लिए आपराधिक मुकदमा आमतौर पर तब तक नहीं चलाया जा सकता, जब तक कि धोखाधड़ी के इरादे या सक्रिय साजिश का कोई स्पष्ट सबूत न हो।</p>
<p>इसमें कहा गया कि न तो एफआईआर और न ही विवादित आदेश से ऐसा कोई ठोस सबूत सामने आता है, जिससे आरोप की पुष्टि हो सके कि अपीलकर्ता ने कथित जाली वसीयत तैयार करने की साजिश रची थी। सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि जहां कोई व्यक्ति स्वामित्व का दावा करते हुए किसी संपत्ति को बेचता है, वहां धोखाधड़ीपूर्ण गलतबयानी के मामलों में आमतौर पर पीड़ित पक्ष खरीदार होता है, न कि कोई तीसरा पक्ष, सिवाय उन मामलों के जहां प्रत्यक्ष रूप से धोखा देना साबित हो जाए। पीठ ने कहा कि असल में, भले ही यह आरोप कि वसीयत जाली थी सही साबित हो जाए, तब भी संपत्ति के खरीदार ही पीड़ित पक्ष होंगे, क्योंकि ऐसी परिस्थितियों में विचाराधीन संपत्ति पर उनका मालिकाना हक विवादों में घिर जाएगा। यह मानते हुए कि अपील करने वाले के खिलाफ क्रिमिनल कार्रवाई जारी रखना प्रोसेस का गलत इस्तेमाल होगा, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आगे केस चलाना 'पूरी तरह से गलत' होगा और यह 'कोर्ट के प्रोसेस का बहुत ज्यादा गलत इस्तेमाल' होगा। इसके अनुसार, उसने पेंडिंग क्रिमिनल केस में अकेले अपील करने वाले के खिलाफ सभी कार्रवाई रद्द कर दी, और यह साफ किया कि बाकी आरोपियों के खिलाफ ट्रायल जारी रहेगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>National</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 28 Apr 2026 18:28:55 +0530</pubDate>
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                <title>मुंबई : उद्धव और राज ठाकरे के एक साथ आने से कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि दोनों सिर्फ बोल-बचन तक ही सीमित;  बालासाहेब के असली वारिस सिर्फ शिंदे -  संजय निरुपम </title>
                                    <description><![CDATA[<p>शिवसेना उपनेता और प्रवक्ता संजय निरुपम ने ठाकरे बंधुओं पर बड़ा हमला बोला है। अंधेरी में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर उन्होंने कहा कि उद्धव और राज ठाकरे के एक साथ आने से कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि दोनों सिर्फ बोल-बचन तक ही सीमित हैं। निरुपम ने दावा किया कि बाला साहेब ठाकरे के ‘ब्रांड’ का असली वारिस केवल डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे हैं। यह बयान दि बेस्ट एम्प्लॉइज को-ऑप क्रेडिट सोसायटी के चुनाव नतीजों के बाद आया। इस चुनाव को ठाकरे बंधुओं के गठबंधन का पहला प्रयोग माना जा रहा था, लेकिन परिणाम में उनका यह प्रयोग नाकाम रहा। चुनाव में एक तरफ मनसे और शिवसेना (यूबीटी) साथ थीं, तो दूसरी तरफ बीजेपी और शिंदे गुट की शिवसेना।</p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.rokthoklekhani.com/article/43305/mumbai--uddhav-and-raj-thackeray-coming-together-makes-no-difference-as-both-are-limited-to-mere-words--shinde-is-the-only-real-heir-of-balasaheb---sanjay-nirupam"><img src="https://www.rokthoklekhani.com/media/400/2025-08/download---2025-08-23t130442.933.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>मुंबई : </strong>शिवसेना उपनेता और प्रवक्ता संजय निरुपम ने ठाकरे बंधुओं पर बड़ा हमला बोला है। अंधेरी में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर उन्होंने कहा कि उद्धव और राज ठाकरे के एक साथ आने से कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि दोनों सिर्फ बोल-बचन तक ही सीमित हैं। निरुपम ने दावा किया कि बाला साहेब ठाकरे के ‘ब्रांड’ का असली वारिस केवल डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे हैं। यह बयान दि बेस्ट एम्प्लॉइज को-ऑप क्रेडिट सोसायटी के चुनाव नतीजों के बाद आया। इस चुनाव को ठाकरे बंधुओं के गठबंधन का पहला प्रयोग माना जा रहा था, लेकिन परिणाम में उनका यह प्रयोग नाकाम रहा। चुनाव में एक तरफ मनसे और शिवसेना (यूबीटी) साथ थीं, तो दूसरी तरफ बीजेपी और शिंदे गुट की शिवसेना।</p>
<p> </p>
<p><strong>शिंदे ने यूबीटी की पिटाई की</strong><br />करीब 15 हजार वोटर्स में से लगभग 12,500 ने मतदान किया। इन वोटर्स में अधिकतर मराठी और भूमिपुत्र समुदाय से थे। चुनाव परिणामों में मनसे-यूबीटी को वोटरों ने पूरी तरह नकार दिया और बीजेपी-शिवसेना गठबंधन को बढ़त दी। निरुपम ने कहा कि यदि आज शिवसेना (यूबीटी) किसी तरह टिक पाई है, तो केवल मुस्लिम वोटर्स के सहारे। अगर यह वोट बैंक भी खिसक गया तो यूबीटी को एक भी सीट नसीब नहीं होगी। निरुपम ने स्पष्ट किया कि इस चुनाव भले ही छोटा था, लेकिन इसका महत्व मुंबई की राजनीति के लिहाज से काफी बड़ा है। नतीजों ने साफ कर दिया कि मराठी वोट बैंक ठाकरे बंधुओं से हटकर शिंदे गुट और बीजेपी के पक्ष में खड़ा हो रहा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>Maharashtra</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 23 Aug 2025 13:06:18 +0530</pubDate>
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